Subrat Saurabh’s “Kuch Woh Pal” : My Review

“कुछ वो पल”
वो हज़ारो में एक है, मेरी मोहब्बत का वो ईनाम है,
वो इम्तिहान है मेरे सब्र, का इसलिए चर्चा सरेआम है।
– सुब्रत सौरभ
 
कुछ समय पहले मुझे अचानक बच्चन जी की ‘मधुशाला’ पढ़ने की तलब हुई… “युट्युब” पर देखने की नहीं…  पर पुस्तक तो मेरे पास थी नहीं  और कोई दे सके, ऐसा कोई आसपास था नहीं… ऐसे में Amazon पर मुझे एक प्रति मिल गई। ‘मधुशाला’ पढ़ने का और पढ़ के सुनाने का अनुभव अविस्मरणीय है।
 
अब जब Blogadda ने “कुछ वो पल” भेजी तो मुझे कुछ नये समय की कविताये पढ़ने की उत्सूकता हुई। हिन्दी कविताओं का संकलन, वो भी युवा कवि सुब्रत सौरभ द्वारा, और क्या कहूँ मै? हिन्दी भाषी और हिन्दी प्रेमी होने की वजह से “कुछ वो पल” मेरे लिए और भी खास है…
 
पुस्तक मिलते ही मैने अपने साथ रख ली, आफिस जाते समय लोकल ट्रेन में पढने के लिए… और पढ़ने में इतना तल्लीन हो गई की पता ही नहीं चला की ट्रेन चर्चगेट स्टेशन कब पहुँच गई। अचानक मुझे लगा की पूरी ट्रेन खाली हो चुकी है और मै आखिरी पन्ने पर हूँ… और क्या कहूँ?
 
“कुछ वो पल” लेखक द्वारा प्रस्तुत बहुत ही संवेदनशील अभिव्यक्ती है, जो आज के समय में मिलना मुश्किल है। 
पहली  ही कविता “क्योंकि आज मेरा शहर छूट रहा था” ने मुझे वो दिन याद दिला दिया जब मेरी बेटी पहली बार हास्टल जा रही थी। मन भावुक हो गया। 
 
अक्सर जो हर गलती मे मुझे औरो से बचाती थी 
और पापा के दफ्तर जाते ही डाँट लगाती थी…
 
लेखक ने अपने जीवन की बारीकियो को बहुत ध्यान से संजोया है और पुस्तक में अभिव्यक्त किया है। बचपन की यादें, युवा अवस्था की कठिनाईंया, बढ़ते उम्र की परेशानियां… सबको खूबसूरती से कविताओं में पिरोया है। 
 
आज की सच्चाई…
 
चाँद को छूने की ख्वाहिश है, पर रात से डर लगता है
घर तो हम अपना भी बना ले, पर हमें किश्तों से डर लगता है।
 
जाने क्यों हम अपना शहर छोड आये है… कविता उन सब लोगों को भावुक बनाने की क्षमता रखती है जो अपना शहर छोड़ के आये है… 
 
मिलता नहीं कोई अपना सा यहाँ… 
यूं शाम में सब साथ होते थे अपने 
अब तो मिलने का बहाना बनाके आये हैं।  
 
हर कविता कोई विशेष मनःस्थिती  उजागर करती है। कवि और लेखक सुब्रत ने संवेदनाओं को अभिव्यक्त करते हुए कविताओं की Rhyming को बरकरार रखा है। हर कविता, कविता है…
 
जितनी खूबसूरती से आगाज हुआ है, उतना ही खूबसूरत अंजाम हुआ है। सुब्रत सौरभ जी सिर्फ टेक्नॉलॉजी  ही नहीं,  मन के, अभिव्यक्तियों के, कविताओं के और भाषा की सुंदरताओं के भी इंजिनियर है।
 
युवा लेखक सुब्रत सौरभ का ये प्रयास अत्यंत सराहनीय है जो देश के युवाओं को हिन्दी कविताओं के प्रति उत्साहित कर सकता है।
कुछ शब्द थोडे़ खटकते हैं जैसे दौड़ जबकि ये शब्द दौर है… तो कौडियों के भाव बिकता है नहीं बिकती है… क्यों कि संदर्भ बोतल है और स्त्रिलिंग है। 
 
जिंदगी का सार आखिरी कविता मे है। जो दर्शाता है कि युवा लेखक कितने अनुभवी है।
 
बात बस इतनी सी हैं करनी जरा गौर है 
जिंदगी से तू चाहता कुछ हैं, और होता कुछ और है…
 
 मुख्य पृष्ठ की पंक्तियाँ ही “कुछ वो पल” को Best – Seller बनाने की क्षमता रखती है।
 
अच्छा किया लेखक ने अपने हौसले को पूर्ण विराम नहीं लगाया।
  “कौन पढ़ता है आजकल हिन्दी मे?” “हिन्दी की कविता कौन पढ़ेगा?”
 प्रश्न पूछनेवालों के लिए, “कुछ वो पल” सटीक उत्तर है। 

 Subrat Saurabh, a young writer, poet and blogger – is popularly known by his pen name “ChickenBiryanii” on Social Media sites. He is proficient in writing witty one-liners, a skill he employs liberally on Twitter or Facebook using his pen name; thereby making his opinion heard on a wide range of issues. Interestingly, writing short stories and Hindi poetry was his hobby since his childhood days which he continues even now and also he is a keen observer of happenings around him and he loves to get poetic with it.

Kuch Woh Pal is a collection of Hindi poems through which the writer takes you on a journey blended with ecstatic and painful experiences of a young boy taking on the struggles of life where he is away from his home for studies, makes new friends, finds love, break-up and finally going through tumult of emotions like anger, depression, apathy, romance, frustration, loneliness, separation etc.

The most notable part of the book is that it has not lost the poetry element, I mean rhyming amidst forceful prose/ expressions…

This review is a part of the biggest http://blog.blogadda.com/2011/05/04/indian-bloggers-book-reviews” Book Review Program http://www.blogadda.com

 

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