Mera Naam Joker: My first window to the world of Films!

आज का दिन अविस्मरणीय … अत्यंत दुखद

आज मेरे प्रिये अभिनेता ऋषि कपूर जी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया
कभी सोचा नहीं था जिनसे मैं कभी मिली नहीं, देखा नहीं उनका जाना इतना बड़ा दर्द दे जायेगा

उनकी फिल्में मेरी ज़िन्दगी का अहम् हिस्सा रही हैं …शायद ही उनकी कोई फिल्म हो जो मैंने न देखि हो, वह भी पिक्चर हॉल्स में

उनकी फिल्मों का जो सिलसिला मेरा नाम जोकर के साथ शुरू हुआ वह आज तक कायम है.

मुझे याद आ रहा एक किस्सा जो में अप्पके साथ साजा करना चाहूंगी. मम्मी मुझे यह फिल्म अपनी सहेलियों और उनके बच्चों के साथ ले गयीं थीं.  मेरा नाम जोकर शायद जीवन की पहली फिल्म थी. बहुत छोटी होने के कारन मुझे फिल्म तो कुछ समझ नहीं आयी और फिल्म क्या होता है वह भी कुछ ख़ास समझ नहीं आया लेकिन भोपाल के पिक्चर हॉल में मैं अपनी मम्मी और उनकी सहेलियों से बिछड़ गयी. मैं अकेली नन्ही बच्ची ज़रूर घबराई पर मैं हिम्मत से अपनी मम्मी को ढूंढ़ने पर मझे नहीं मिली. इधर मम्मी और उनकी सहेलियों ने जब बस में देखा तो मझे न पाकर शोर मचाया. बस रुक गयी मम्मी गुड़िया गुड़िया ( मेरा प्यारा नाम) करके मुझे ढूंढने लगी. आज मैं समझ सकती हूँ उनकी हालत.

मैं ज़रा सी बच्ची इधर उधर भटकने के बाद, एक यूनिफार्म वाला पुलिस को देखा. मुझे लगा यह अंकल मेरी मम्मी को ढूंढ सकते हैं. मैंने उन्हें बताया की मेरी मम्मी भी मुझे ढूंढ रही होंगी और वह आएँगी. पुलिस वाले ने मुझे ऊपर दीवार पर मझे बिठा दिया जिस्सकी मम्मी मुझे देख सकें. थोड़ी देर बाद मैंने मम्मी और आंटी को अपनी तरफ आते देखा. फिर मैं पुलिस अंकल को बाई करके अपनी मम्मी के साथ हो ली. पुलिस वाले ने मम्मी से कहा आपकी बिटिया बहुत समझदार है! मम्मी का अब तक रो रो के बुरा हाल हो चूका था.

मम्मी आज भी इस किस्से को याद करके दर जाती हैं…और मैं …

तो चिंटू जी यह था जीवन की मेरी फिल्म और आपकी पहली फिल्म का आमना सामना

मेरा आपके व्यक्तित्व एक्टिंग करिज्मा स्टारडम के प्रति लगाव सर्व विदित है. आपने ही पहली फिल्म से मुझे फिल्म का साक्षात् कार कराया…यह सिलसिला थमा नहीं …

बॉबी पिक्चर की कहानी भी इसी का हिस्सा रहेगी

आप बहुत याद आएंगे!

Dekh tere sansar ki haalat kya ho gayi bhagwan?

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान

आज जब पूरा विश्व कोरोना संक्रमण से ग्रसित है, सब पूछ रहे हैं की मैं क्यों कुछ नहीं लिख रही.

क्या लिखूं सब तरफ कोरोना का ही रोना है. ह्रदय विदारक दृश्य हैं . न्यू यॉर्क देखो, इटली देखो, स्पेन देखो, ब्रिटैन देखो और भारत तो देखो ही देखो.

घंटो के अंतराल से कोरोना फैलता जा रहा है. बहुत सी बातें बोहोतो की समझ के परे हैं.

वायरस क्या है? कहाँ से आया? कौन लाया? कैसे फैला? कैसे इतना विनाशकर बन गया?

इन सब विषयों पर अभी तक चर्चा जारी है. चारो और होड़ है, मुझे जो पता है वही सत्य है, वही सही है.

एक छोटे से जीवाणु ने बड़े बड़ों को धरा शाही कर दिया. देखा दिया कभी किसी को काम मत समझो.

जो यूरोप, अमेरिका, ब्रिटैन अपनी प्रगति की धाप जमाते नहीं थकते थे आज उसी टेक्नोलॉजी के आगे घुटने टेक चुके है. बेसिक गिनती गिनने पे मजबूर हैं वह अपने देश के मृतक देशवासियों की.

क्या इससे बड़ी कोई विडम्बना हो सकती है?

समय चक्र बड़ी तेज़ी से घूमा है.

जब लंदन, टोरंटो, पेरिस देखा तब सोचा के हम कितने पिछड़े हैं. यहाँ के लोग कितने मज़े में हैं. हर तरफ सुख सुविधाओं का अम्बार, एक बटन पर सब हाज़िर, कितनी सरकारी सुविधाएँ. मैंने सोचा हम तो इनसे १०० बरस पीछे हैं.

एक गुजराती परिवार में विवाह होने पर पहली बार पता चला की अमेरिका का स्थान उनके दिलों में भगवान् से ऊँचा है. हर परिवार में से एक बच्चा अमेरिका लंदन या टोरंटो में हैं. उनकी बड़ी शान है …और जो यहाँ है चाहे वह जो भी हों – ला हॉल बिला कुवत. लानत है उनपर. उनके लिए भारत वर्ष में कुछ नहीं, आप आईएएस हों, डॉक्टर हों, मीडिया में हों, एडिटर हों, इंजीनियर हों, टीचर हों, कोई भी हस्ती हों

लेकिन अमेरिका के डॉलर के आगे कुछ भी नहीं,

यह कुछ परिवारों की कहानी नहीं, अनेक गुजराती परिवारों की गाथा है.

अमेरिका के प्रति प्रेम की अंतहीन सीमा, शायद अब कुछ जाग्रति आये. हिंदुस्तान की हस्ती समझ में आये.

जो डॉलर नहीं कमाता उसका जीवन व्यर्थ है.

सारा परिवार दिन रात इसी आशा में जीता की कब अमेरिका की फाइल खुलेगी और हम अमेरिका जायेंगे. वीसा के लिए जाना एक त्यौहार के सामान था, और वीसा रिजेक्ट होना मातम.

खैर कौन गया, कौन रहा, कौन ऊपर गया, कौन अब भी इसी आस में जी रहा था, की कोरोना ने ऐना दिखा दिया. मुझ अकेले ने इतने वर्ष समझाया की – अपना घर फिर अपना घर है पर समझ नहीं आया.

आज देख लिया उनके लिए व्यापार सबकुछ हमारे लिए इंसान सब कुछ.

कुछ कड़वी सच्चाई: भारत में रह रहें ७००० अमेरिकी में से सिर्फ ८ अमेरिका जाना चाहते क्यूंकि पता है भारत सेफ है, यहाँ की मेडिकल केयर में इंसानियत है, डॉक्टर्स, नर्सेज भगवान का रूप है, मोदीजी को हर जान की कीमत है.

जिस मेक्सिको से इललीगल माइग्रेशन रोकने के लिए दीवार बनाई थी आज वहीँ अमेरिकन वहां इल्लिगल्ली माइग्रेट हो रहें हैं.

आज भारत का ज्ञान, ध्यान, संस्कृत, दर्शन ही एक मात्र सहारा लग रहा है. इस जीवाणु को मारने में हल्दी, तुलसी, आवला, हॉट वाटर, साफ़ सफाई,  भगवान का नाम ही कारगर हैं. अब कोई दवा काम करती नहीं लग रही है.

और तो और विषमता देखिये – जानवर हमारे बनाये रास्तों पर, बढ़िया टेक्नोलॉजी वाली सड़कों पर, गलियारों पर, हमारे आँगन में बेखौफ घूम रहें हैं और हम पिंजरों में बंद हैं. कब तक कोई नहीं बता सकता.

कोरोना चीन के वहां शहर से आया वायरस है जिस पर उन्होंने काबू प् लिया है. आज जब सारा संसार मूक द्रष्टा बना हुआ है इस महामारी कई बड़े बड़े देश इस ज़्याददति पर आवाज़ नहीं उठा प् रहे है. मौत का तांडव देख रहें हैं, कितनी तस्वीरें ह्रदय विदारक हैं.

शेक्सपियर की पंक्तयों से अंत करना चाहूंगी: A man with a sword perishes with a sword

Please watch this lovely song…